हिंदी काव्य-संग्रह
समय नदी है — पुस्तक आवरण

समय नदी है

“धूसर समय है और वही सपनीला रहा... समय नदी है।”

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About the Book

पुस्तक के बारे में

समय नदी है — आवरण

'समय नदी है' जीवन के प्रति एक संवेदनशील और पारखी दृष्टि प्रस्तुत करता है। कवि के लिए समय केवल बीतता हुआ काल नहीं, बल्कि एक जीवंत नदी है — जो सबको अपने साथ बहाते हुए भी स्वयं अविराम गति से आगे बढ़ती रहती है।

इन कविताओं में जीवन के संघर्ष और पीड़ा के बीच भी एक आशावादी और जीवनधर्मी स्वर बना रहता है — जो हर अंधेरे के पार रोशनी की ओर देखता है।

प्रकाशक — ग्रंथ भारती
Poems

कविताएँ

कविता — एक

समय नदी है

धूसर समय है और वही सपनीला रहा...
समय नदी है।
छलछलाती इसकी यात्रा अंतहीन–अविरल
जिसे आज तक
कोई रोक नहीं सका
जो अकेले में बहती रही–सन्नाटा पीती हुई।
अपनी डगर की डोर से बँधी भी आगे बढ़ती रही–निर्बाध!
इन्द्रधनुषी होकर भी
असीम सैलाब अपनी छाती पर ढोती रही!
सूखी धरती को हरा–भरा करती रही!
अपना धर्म निभाती रही!
इसे न दुलार मिला, न किसी का प्यार
यह लँगड़ाती
फिसलन पर चलती रही
अपनी डगर आगे बढ़ती रही–
प्रचंड धूप में यह
भूरी चट्टान पर पकती रही
सोते–सी निर्मल
गहरे सँकरे नालों में घुट कर
ऊबड़–खाबड़ में चल–चलकर
तिरछी ढालों पर छल–छल बहकर
आगे बढ़ना सीख गयी
हमेशा अपनी डगर आगे बढ़ती रही!
यह जीवनदायिनी है–
जो हरे–भरे गाँवों, कस्बों
खूबसूरत शहरों से गुजर कर
सबको धोती रही–निर्मला
सबकी मैल पचाती रही।
अपनी डगर आगे बढ़ती रही–
यह तरनतारिणी
शिव उपासिका है
सबका गरल पीकर
अपरिचितों के बीच शोषित रही...!
शीत में सिकुड़ कर
ग्रीष्म में उफन कर
सबकी थकान मिटाती
सफलताओं की कामना करके
यह सबको हँसाती / खिलखिलाती / गुनगुनाती रही।
अपनी डगर आगे बढ़ती नदी...
अपना ताप / अपना ज्ञान
सबको बाँटती हुई
सबकी डाँट,
सबके व्यंग्य बाणों की बौछारें
सबकी फटकार को
अपनी आत्मकथा में पिरो कर
अपने भाग्य को सहलाती रही
अपनी डगर आगे बढ़ती रही–

□ □ □

किसी ने बाँधना चाहा–इसे तो
किसी ने इसकी छाती लहूलुहान कर दी
किसी ने सारी गंदगी फेंक दी–इसके बीचों–बीच!
फिर भी यह जिन्दा और मरों को ढोती रही
सबको प्यार ही बाँटती रही–फ़कत!
अपनी डगर आगे बढ़ती रही–...उज्ज्वला!
अपने जीवन के उत्तरदायित्वों को निभाते
पिता समान पर्वत...
माँ समान मैदान...
भाई / बहन समान नालों के कर्ज को
अपने कतरा–कतरा लहू से
गंगा समान
सबका हिसाब चुकाती रही!
सबकी फाकापरस्ती को दूर कर
खेत–खलिहानों को भरती रही!
सबके मुरझाए चेहरों को खिलखिलाती रही
अपनी डगर आगे बढ़ती रही...पुष्पिता!
अब जीवन के आखिरी पड़ाव पर
यह सोचती है–
न अपना घर हुआ, न घाट...
न अपना मधुर संसार बसा...
न अपनी सुंदर फसलें उगीं...
न थोड़ी देर बैठे विश्राम ही किया।

□ □ □

अब तो
न किसी से कोई प्रतिशोध
न किसी से शिकायत
न किसी पर आरोप
यह अपने गहरे घावों को सहला
अंधेरे में एकांत में / गुमहोशी में...
छिप–छिपकर रोती रही...विलीना!
अपनी डगर आगे बढ़ती रही...जल–पुत्री।

□ □ □

यह सब कर्मों का फल है
जो मिट चले
जितना जीवन में दुःख भोगा
उतना ही स्वच्छ दामन लिए
इस जगती से–
मुक्त हो चली, अब तो
सामने यह विराट सागर
अपनी विशाल बाहें फैलाए
अपने आगोश में भर लेने
मधुर संकेत दे रहा–उसे
तट के उस पार / निमंत्रण मिल रहा है!
(पता नहीं, यह अभिसार है या विदा!)

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — दो

नया प्रतिबिम्ब

अंधेरे में
घुँघराले केशों की झालरें
भुरभुरी दीवारों के
कंधों पर लटकती हैं
तब एक टुकड़ा आकाश
बिल्कुल अकेला होता है
उसकी ढीली मुट्ठियों में
फौलादी साँसों की
अंतिम खुशी गायब होती है–
कुछ लोग होते हैं
काली आँधी झेलते हैं।
एक पेड़ गहरी चुप्पी साधे
सन्नाटे में सिहरता है
एक नन्ही सी चिड़िया
आश्रय ढूँढ़ती है
उसकी खुली चोंच
पड़ोस में पल रही
पालतू कुतिया की शैतानी
और किसी छत पर
डूबते सूरज का इंतज़ार करती है
एक बेईमान शाह
अपनी बही खाते में
नया लेन-देन जोड़ता है
आटे-दाल का भाव चढ़ता है
लूण-लकड़ी नदारद होती है
लम्बी कतार
शिखर दोपहरी झेलती है।
खूँटे से बँधी
भूखी गाय रंभाती है...
दूध देने की बजाय
लात मारती है
उसके टल्लुओं पर।
पैबंदों के सूरज
समूची देह में
झुरझुरी पैदा करते हैं
उसके हमेशा बुदबुदाते होंठ
प्रार्थनाओं से भरे रहते हैं।
किसी नेता के चुनावी वायदों को
याद करते हुए
उसके पेट की भूख सदा के लिए
विश्राम करना चाहती है
और नंग-धड़ंग बच्चे
उसके ढलते उरोजों से
जीवन-रस की आशा करते हैं
यह सच्चा लोकतंत्र है।
विदेशी कम्पनी के उपहार
क्या मेहतरानी की बेटी को खुश रख पाएँगे?
क्या पत्थर तराशती महिला मजदूर
ठेकेदार के बिस्तर को
अपनी पसीजी खूबसूरती से
गरम रखने के लिए लाचार नहीं रहेगी?
आने वाली शताब्दी में
हम सब चाँद पर होंगे
यहाँ बियाबान जंगल
क्रोशिए से काढ़ेंगे
नये सत्यों के
रंगीन बेलबूटे
लालाजी की तिजारत के फूले पेट की
सजावट निखरेगी।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — तीन

कैसे याद करूँ

कैसे उन दिनों को याद करूँ
जो खौफ़नाक दुःस्वप्न बन रह गए
जिन्हें मरणशील सरिसृप
और अधिक बदसूरत बनाते हैं।
यह शिखर दोपहरी...
चीड़ वनों को निगलती भभकती रही
कितनी भयावह लगती रही
ओ मेरे मित्र!
इस ढलती ज़िन्दगी के घनेरे अंधेरों के लिए
हमेशा तुम्हारा आभारी रहूँगा
लेकिन अभी ये राहें
कहाँ थमी हैं–
जो तुम्हारे घर की देहरी तक जाती हैं।
अभी भी
वक्त की बाँहों के साये
कहाँ पीछा करते नहीं थकते।
अंधेरे के लिबास में सुरसा
कितने ही कुंवारे बसंत निगल गई।
इस पड़ाव पर
जिन्दगी के मैले वस्त्र को
तुम्हारी स्मृतियों की गुस्सैल धोबिन
कैसे पछाड़-पछाड़ कर
पटकती रही...
और तुम्हारी छत पर टंगी अलगनी पर, हम
निचुड़ते रहे–
कैसे बचे जीवन के लिए
असंख्य मनौतियों के सूरज को
लबालब अंजुरियों में भर कर
पीता रहा...
सिर्फ एक पल का हजारवाँ हिस्सा
सुकून पाने के लिए–
कैसे इन आकाश वीथियों में
तुम्हारी सूरत बुझती नीहारिकाओं में
देखता रहा।
जहाँ तुम्हारे शहर की समूची
आकर्षक हँसी मनमोहक ठहाके
नशीली आँखों के जोवन
कैद थे सदा-सदा के लिए।
दो सुंदर जिस्म फिसल कर
मन तक, प्राण तक अभिभूत थे।
लेकिन पर्वतों के आर-पार
सर्दीला सैलाब उमड़ता रहा
इस अंबर पर मन के बादल
पूनी की तरह बँटते रहे...
लगातार संवेदना घुटती रही
अभिव्यक्ति तड़पती रही
भाषा पाने के लिए
ओ 'मित्र'!
इन हसीन वादियों के हंस
अंधेरे से लथपथ
तुम्हारी छत पर उगते सूरज की
मात्र एक किरण के लिए
तड़पते रहे
लेकिन तुम तो तीसरी दुनिया से
हमेशा के लिए उड़ गए।
पहली दुनिया के उज्ज्वल भविष्य को पाने के लिए
अब यहाँ मटमैले अंधेरे में
आशाओं के परिन्दे
घुट कर रह गए हैं
और पीली धूप के जिस्म पर
शरारती हवाएँ
सतरंगी पंखों को
मरोड़ कर
खौफनाक संवाद झेलने के लिए
विवश कर गई हैं।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — चार

एक अंत और

काले साए
ढलते सूरज के साथ
अक्सर बढ़ते जाते हैं।
दरकती जमीन की बिवाइयाँ
प्रेयसी, माता-पिता और बेलाग दूरियाँ
स्याह अंधेरे में खुसफुसाती हैं
यारो! नदी किनारे बैठे हैं
बिल्कुल निःसहाय
लेकिन कर्मशील
कभी तो लहर आएगी।
कतरा-कतरा अंधेरा
गुनगुनी बहसों को बटोर कर
विवश धरती की रंगीनियाँ, हँसती मुद्राएँ
और यौवन कोष
निचोड़ चुका है।
अब अदृश्य मोर्चे मजाक लगते हैं
और सिकुड़ी जगह के लिए
चारों दिशाओं का खुलासा संदेहास्पद है।
भाई-बहन, पड़ोसी और बेलाग दूरियाँ
इनके दिलों में सूखा पकता है।
घृणा से भरे चेहरे रिसते हैं।
यारो! नदी किनारे बैठे हैं–
बिल्कुल निरुपाय लेकिन संघर्षशील
कभी तो लहर आएगी।
याद है
शहर लौटा था चौदह साल पहले
सड़कों पर रेंगती गर्द और तैनात सिपाही
गलियों की भरपूर संडास और नथुने
कल कारखानों से रिसते धुएँ के गुब्बार
और पगलाया शोर
बावजूद समूची थकान, बदहवास
अकेलेपन के साथ
मुँह चिढ़ाते गाँव के किनारे
थामा था तुमने।
संबंधी, मित्र, ये लोग और बेलाग दूरियाँ–
ईर्ष्या और घिनौनी साजिशें
दिलों में पकती हैं–
अमानवी होने तक।
यारो! नदी किनारे बैठे हैं–
बिल्कुल खौफ खाए
लेकिन सृजनशील
कभी तो लहर आएगी।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — पाँच

अकेले चलते जाना

हाथ हिलाते इशारे
चलते हुए हाल पूछते हैं।
फूल बरसाते अंगारे
दिल में जख्म देते हैं।
लूटा चमन पुकारे
अकेले चलते जाना है–
वादियाँ हँसते नजारे
भीगी पलकों को निचोड़ते हैं।
जिन्दगी के स्याह अंधेरे
रोशनी के लिए तड़पते हैं।
मौसम छुअन सिहरे
अनंत यातनाओं को झेलते जाना है।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — छह

बंद मुट्ठियों में

वह चुपचाप आता है–
उसे न कोई देख सकता है/और न ही सुन सकता है।
ज्यों ही बीहड़ से उतरता है
निरीह प्राणी अपनी भाषा खो बैठते हैं
और बिल्कुल मिट्टी बन जाते हैं।
बाघ एक दुःस्वप्न है
जो विद्युत की भाँति
समूची देह में दौड़ जाता है।
पहले हरी-हरी घास चरता है
फिर अदृश्य होकर
जल्दी वापस आने का वायदा कर जाता है।
वह नहीं होता है–
उसकी न टाँगें, न पूँछ होती है
सिर्फ उसके लम्बे दाँत होते हैं
जो किसी भी मांसल पिंजरे पर
गड़ सकते हैं।
जिसके लिए वक्त जरूरी नहीं
दिन-रात का अंतर नहीं
वह निस्संग चलकर
बच्चे, बूढ़े, नौजवान पेड़ पर
पलक झपकते चढ़ जाता है।
गाँव/शहर/बियाबान सब कहीं
वह ढेर नहीं होता
बल्कि मीठी नींद सोता है।
जो विषैले फल लिए
हर पेड़ की छाल में छिपा रहता है
समुद्र के तल तक
गहरे उस आकाश में
अपनी मुट्ठियों में भींच सकता है
हर कहीं चलती, रेंगती, घिसटती देहों को
जो ताकत वालों का
बिना लाइसेंस हथियार है
जन-जन में
लीडरी की श्वेत छवि है
यह होनी अनहोनी
गुमशुदा लाल पिटारी है
जो नाउम्मीदों के लेखों से भरी
लालफीताशाही से बंधी है।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — सात

यह अंतिम सूरज

अनदिखा यह अंतिम सूरज
दिख जाता है कभी-कभी आर-पार
उस अंधकूप में फलाँगता हुआ...
जहाँ गौरैया के फुदकने से लेकर
इंसान बनने की
टुट्ट भुजी परिभाषा की प्रतिध्वनि गूँजती है
सिर्फ आसमानी छाया को
लाजवाब करने के लिए–
बेचारे–
वासंती मौसम
रेंगते हुए लाख-लाख प्रश्नों के बवेले
अपने सिर पर हैं झेलते
तब एक सुनहरी चिड़िया के मीठे बोल
आकर्षित करने लगते हैं
माँ की मीठी लोरी से लेकर
बिलखते बच्चे के अलसाने तक...
और अपनी मुर्दा जमीर को
भयंकर हवाओं के रुख़्सत होने तक
अपने वजूद को घुटता देखकर
यह अंतिम सूरज के उगने का
इजहार करते हैं।
फिर भी
व्यर्थ भरमाने के लिए
उल्लूक-मण्डली के घोषणा-पत्र
कमजोर आदमी के लिए
एक पका हुआ फलसफा बन जाते हैं।
इस मैले-कुचैले अंधेरे में
नये-नये क्षितिज ढूँढ़ने के लिए।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — आठ

एक घबराया आदमी

सरहदें निकल जाएँ
चाहे कितनी भी दूर...
आखिर खोखले दिलासे
ग़मगीन बना ही जाते हैं।
तब अधर में लटकी पृथ्वी पर
हम सब समतल दिखते हैं
क्योंकि सरपट दौड़ती सड़कें
नादान बनकर
हमारे अन्तःस्थल से गुजर जाती हैं।
किंतु एक मीठी कल्पना
अंधेरे के टॉरनेडो को देखकर
आपसी विश्वास को जोड़ने की बजाय
पीछे हटने का काम करती है।
तब हम बिल्कुल अकेले रह जाते हैं।
ढहते आकाश को
अपने कमजोर कंधों पर उठाने के लिए–
शायद खुरची हुई शराफत ओढ़कर
कोई ढिंढोरची
मनुष्यता के शव पर
विलाप कर सके–
अक्सर गुसलखाने के नक़्शे पर
नंगे होते हैं–
मन के भीतरी भाव
जो एक खूबसूरज पहनावा बन जाता है।
और कोई गीले बालों से
पानी टपका-टपका कर
खड़ी पीठ को गीला करता-सा
क्योंकि हमेशा चुस्त स्मार्ट भाषा
बाजी मार लेती है।
एकदम असली खूबसूरती बटोरने में
ताकि कुरूपता मोरी से निकल कर
खुली सड़क पर फैल जाए–
तभी
सनसनाते सन्नाटे के बीचों-बीच
टुक घबराया-सा आदमी
दबे पाँवों से चलकर
बारादरी के चबूतरे पर
थूकता हुआ...
...वहाँ की तुच्ची राजनीति पर।
आगे बढ़ जाता है।

□ □ □

अचानक दनदनाता हुआ–
अभिशप्त–बाकी बचे देश और
शताब्दी को कोसता हुआ
कोई भीत गीली करता है–
अंत में।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — नौ

अंतहीन सफ़र आगे...और आगे

इस दौर में
आकाश के होने का अर्थ है
अपनी ही धरती से कट कर
रह जाना
हमेशा-हमेशा के लिए–
छबीली चिड़ियों से अलग होना
बाज होना होता है
जिसका आहार ही रक्त है–उसका।
वक्त हुकूमत
उसकी नुकीली चोंच और तराशे पंजे हैं
इस सभ्य जंगल में/पहले की तरह
उसकी शिकार पर
खुरदरे कँटीले पंजे तत्पर/पंख स्थिर होते हैं
और दिमाग़ खतरे के घेरे में लेता
कमसिन प्राणों को
वैसे ही
आज तक रेंगता आया है
कितने ही फाटक रोकें
उसके गले में बदशक्ल गिल्लड़
और अंगुलियों की गाँठों में
ताजी धड़कने फैल कर
शक्तिशाली इतिहास बन जाती हैं
किंतु जिनके पास विष होता है
वह अजगर होता है
जो पहले साबुत निगलता है...
फिर कुबड़े पेड़ पर चढ़ कर पचाता है।
उसके सिर पर सिंहासन होता है।
वह अपनी ही जाति का भक्षक होता है।
प्रभु-गुण गाता है–
क्योंकि उसके पेट में रोटी होती है
और कानों में मंदिर की घंटी।
वह प्रभु का साया बनकर
शैतानी नृत्य करता है।
उसके सिर पर अहं का स्राव होता है
यह देख कर...
मैं हर मील पत्थर से पूछता हूँ–
सफर आगे...और आगे
कितना अंतहीन?

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — दस

अदम्य आकांक्षा

यह घर नहीं, भूत-बंगला है
आदमी नहीं, नागों का बसेरा है यह।
चिरकालिक कोई नया जलजला
ट्रांसमीटर पर आते ही
सुरक्षा कवच अंदर से बिलबिलाने लगते हैं।
और खुराफाती साँसें
शिकार पर टूट पड़ती हैं।
अपने सब
तब मीलों फासला लाँघ जाते हैं...
अब
उनसे मिलने में भी डर लगता है...
तब भी कभी...सुरमयी सरकंडों पर झूमा-इठलाया
और कभी-कभी हारा हुआ प्रेम भी
शेष-निश्शेष स्पर्श की
ठंडी–खामोशी में...
रात की रोशनाई में डूब जाना चाहता है
अपने लिए घनी हरियाली में...
छिप जाने की बीती चाहत लिए।
लेकिन स्याह रात के
बदशक्ल परिंदे बेवक्त
सूरज उगने के सन्नाटे में
जश्न मानते हैं।
मैं हाँफती हुई वजूद बाजी को
घिसी हुई अंगुलियों से पकड़ कर
बेसुरे रागों पर अलापता हूँ।
ताकि मुझे इस भूतहा शान्ति से मुक्ति मिल जाए–
दूर नीलाभ सागर के विस्तार में
मेरी लौह दर्दीली आवाजें टूट-टूट कर
बिखरती हैं लहरों पर!
काश! मेरी नाउम्मीदी को
बेहतरी से जीने का टिकाऊ आधार हासिल होता
उम्मीद भरे एक दिन की छाँह में।
आँधी बनकर क्यों
मेरी ही अस्मिता पहले घूरती है
फिर जलतरंगों की तरलता में
उपहास करती है।
इस मुँहजली के तेवर
घिरनी की धुरी-से घूमते हैं
और प्रार्थनाओं से भरी–
अर्ध शताब्दी की अधजली लाश को
शून्य में उठा देती है।
बिल्कुल निचोड़कर पी जाने को
इसकी बाकी वंशावली
बेदर्दी से पीड़े डालती है।
इस कविता को अलिखित रह जाने तक
हे देव!
इन हिमखंडों के पिघलने की
नई दास्तान को
अब खड्ड-नालों में नहीं छिपाना।
रेगिस्तान से सागर तक...
अंतहीन अनंत बन जाने दो इसे
ताकि इसकी अद्भुत अदम्य आकांक्षा
झुलसती मानवता के लिए किसी धूसर पल में भी
हिमालय हो सके!

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — ग्यारह

नये जमाने में जीते हुए...

जिनके पास कफन नहीं होता
उन्हें हर निवाले का हिसाब
अपने होश और जोश के
एक-एक कतरे से चुकाना पड़ता है।
क्योंकि स्याह अंधेरे
पहले सिरफिरे कुचक्र रचते हैं
फिर फैसलाबाद के किले पर
शातिर दलीलों की झड़ी लगा कर
गर्म सींखचों पर
सफेद घास पकाते हैं।
और जमों की खुरली के आगे
फनकारी जुगाली करने के लिए
फेंक दिए जाते हैं...
यह अफलातूनी प्रभुता
लम्बी सड़क पर रेंगती हुई
दर्रों को पार करती हुई
समूची पृथ्वी को अपने पद तले कुचलती है।
सर्वशक्तिमान बनने के लिए...
ये अपनी स्वार्थांधता का दर्शन
सिल्ल-बट्टे से सुरमा बना कर
बाकी की आँखों में झोंक देते हैं।
चिपकू-चिचौरी भाषा में!
एक ही तथ्य को चबा-चबा कर
विष भरी फुंकार में बदल कर
उछाल देते हैं
चाहे सुहावनी हवा हो
चाहे ग्लेशियर हो...
नये जमाने के प्रभु...
सर्वोच्चपद-पालक...
नव निर्माण से पहले लोक भूमि का
छिद्रान्वेषण करना नहीं भूलते।
दमदमे की चोट पर किसी
अवतारी पुरुष की करारी हार की घोषणा से
नारायणी कल्पनाएँ थम जाती हैं।
विश्वास की लौ बुझने लगती है।
कोई फकीर गाता है–महानगर की बुर्जियों पर...
'दुखिया दास कबीर है जागे और रोए
और मैं पैरोडी बनाता हूँ–
'सुखिया दास नराधम है
सोए और हँसे'।
यही मेरे समय का उथला-जल है–मेरे कंठ में।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — बारह

नया बियाबान

आकाश के सिकुड़ जाने पर
चपर चिड़ियों की फुदकन
हरी-हरी घास की पत्तियों पर
बिखरती है।
कभी न स्थिर होने के लिए
तब नदी के रंगीन होंठ
नव शिशु से खुले रह जाते हैं
और कुछ भाँप कर
सर्पीली उत्तेजना से
झुरझुरी-सी होने लगती है उनमें
दूसरे घाट पर
धूल खाई स्मृतियों की
मटमैली घास को–
शव से ढकी चिता से भड़कते शोले
अकस्मात उमेठ लेते हैं,
मृत सपनों को सुरक्षित रखने के लिए...
वहाँ बासंती मौसम को
अघोरी कौए/बिलाव चबा-चबा कर भयावह बनाते हैं
बासंती मौसम को।

□ □ □

दिन-रात को कर्कश करती
हैवानीयत
मनुष्यता को लीलने के सपने देखती
नये युद्धों के मोरचे खोलती है।
सूरज लहू-धूप में होली खेलता है।
जहरीली-रक्तिम हो चली हवाएँ भी डँसती हैं
दाता! तूने यह कैसी घड़ी दी
इस पीढ़ी को–
जो भविष्य की संपदा को
सच नहीं होने देगी।
देखो तो! जंगल-जंगल
दरख़्त खोहों से भर गए हैं।
वहाँ आतंक का घना बसेरा है।
पसरा है चारों तरफ नया–बियाबान।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — तेरह

अनकही कविता के लिए

मैंने कब चाहा–
अनकही कविता के लिए
गदराए मौसम के हरे-भरे सीने पर
कोढ़ और गिल्लड़ों के
बदरंग फूल उग आएँ अथवा
समूची धरती
बिल्कुल बदशक्ल बन जाए।
जिस वंश की अमरबेल पर
मैं उगा था
उस पर कभी भी
कविताई के कुसुम नक्षत्र नहीं चमके।
मुझे याद है–
यह तपते खपरैलों के नीचे
घुटे-घुटे आकाश में
पसीने से तरबतर जननी की सूखी चमड़ी से
अमृत रस की आकांक्षा लिए रही
कई बार बिगड़ैल शाह की
त्यौरियाँ देखकर
और आँगन के छोर तक
माँ तमाम व्यस्तताओं के बावजूद
हमारे कुनबे की लाज बचाती रही।
भाई/बहनों का टोला–
और नंगधड़ंग देहों पर फटे चीथड़े।
पेट की कुलबुलाती अग्नि
मदरसे की फीस के लाले
वर्दी के लिए झिड़कियाँ
माँ की फटी पुरानी साड़ी से झाँकती देह।
पिता की फिजूलखर्ची
चक्रवृद्धि ब्याज के परनोटों के ढेर के लिए
इसी ने नासमझ हाथों में बेलचा
सिर पर फावड़ा
और जूठन की मांजन का जिम्मा थमाया था।
इसी ने समझौता करना सिखाया
जिससे सरस्वती बरस पड़ी
किंतु बेकारी ने लादे हज़ार-हज़ार दिन
इन कमजोर कंधों पर।
और एक बेहद बदसूरत सपना
शुरू हुआ–
जिसके चारों तरफ
रुग्ण पत्नी की कराहें
और गहरे अंधेरों के अवसाद
लाला का उधार
चूल्हे से गिड़गिड़ाते रहना
इस अधरंगे जीवन के
बेढंगे मोड़ पर जब पहुँचा था मैं
तब मुझे तनिक रोने नहीं दिया
वरन् यह कविताई ही
मेरी दुर्दशा पर दहाड़ें मार रोई थी
मैं धीरे-धीरे मौन होता गया
अब इस सीलन और बदबू भरे
अंधेरों के बीच–
मानो मैं अदृश्य हो गया हूँ।
धीरे-धीरे अपनी फफूँदी छाया को
सिकुड़ता देख कर।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — चौदह

यह बदली अस्मिता

यह बदली अस्मिता
स्यापा करती है श्वान-सी!
जो मेरे अन्तरतम में
दुखते जख्म छोड़ जाती है
रिस-रिस कर बहने के लिए

□ □ □

शायद सूखे पेड़ के मुरझाए पत्तों में
अभी भी कहीं
हरियाली की रेखा बची हो।

□ □ □

पहाड़ के सिर पर नुकीले सींगों
और मैदान के हाथों के पैने नाखून
एक-दूसरे के सामने हैं।
इसलिए विरोध तो होना ही हैं

□ □ □

अब मेरे अन्तःस्थल की राख मिट्टी पर
कुछ नहीं उगता
सिर्फ धूसर सपने हैं।
अब मैं अपनी
खण्डित अस्मिता के सामने बेबस हूँ
और जड़-सा रह जाता हूँ
मानो
जीवन रुका-सा हो
इस चहारदीवारी के भीतर
अक्सर बादल फटते हैं
भारी जलप्लावन होता है
खड्ड नालों के भविष्य की आशंकाएँ और
खाइयाँ गहरी हुई हैं।
आपसी मतभेद
कुंठित मनोदशाएँ
शेष हैं...शायद!

□ □ □

यह जंगल खुफिया सन्नाटे से भरा है
काले बादलों के साए में
ऊँचे पहाड़ खो गए हैं।
घाटियाँ लुप्त हैं
ऐसे समय में–
कोई किसी का लिहाज नहीं करता।
केवल विकृतियाँ
घिनौनी गालियों के व्यापार का झोला लटकाए
अभिवादन करती हैं।

□ □ □

दबी कुचली ज़िन्दगी हमारी-तुम्हारी
नये परिवर्तन के शैवाल पर
फिसलने की प्रतीक्षा करती है।
यहाँ कोई रिश्ता नहीं–सात्विक/शाश्वत!
न प्रेम की उज्ज्वलताएँ/उसकी संरक्षक।
यहाँ सब भीतर से राक्षस होने की हद तक
बहके हुए या माफिल हैं–उससे।
जो झूठे अहं की लड़ाई में शामिल हैं
पैंतरेबाजी खेलते हैं–खूब
आस्तीन के ये बगलगीर सर्प साँप बन कर
एक-दूसरे के सामने ही प्रतिद्वंद्वी को
साबुत निगलने में मशगूल–बेहिचक।

□ □ □

ये ब्रांड कपड़ों की फैशन परेड में–भांड
नजर आते रौबीले-जोकर और
मॉल क्लचर की धड़कन बनी-मरमरी-मादाएँ!
नवेली-धूर्त-अप्सराएँ!
हिन्दुस्तानी-सर-जमीन की किस मिट्टी की–
उपज है–आखिर? किस समाज की ललनाएँ?

□ □ □

चमकीले 'अपर क्लास' की खाल में–
छिपे-छिपे/नये मैदानी/पहाड़ी इलाकों की
शरमाहट-गरमाहट/हरेपन और खेतियों को
हेरते/घेरते! पोखर के पानी में–टहलते!
जवाँ फसलों ओर हवाओं को फार्महाउस के हिंडोले में
समेटते! 'पोलुशन-फ्री' स्टाम्प पेपर पर
लिखकर-बेचते बढ़ती कीमतों में झूठ!

□ □ □

उधर, उजाड़ में बसाये गए–अपने ही–
गाम–गुहांड/कस्बों से दूर दिहाड़ी मजदूर।
निचले-समाज।
रोजमर्रा की परेशानियों से लड़कर खपते रोज!
नकारते हुए अपना होना
और धन-पशुओं की चाकरी में हँसना-रोना!
खराद पर या सीमित संसाधनों में
जुते ये लोग–पहले चाँदी के बर्क
कूटते थे–दिल बचाकर! अब खुद को कूटकर
केवल संडास बना पाने की कुव्वत रखते हैं।
सबसे 'जी राम जी' बोलते हुए–
रोज नये रोजगारों की लालसा लिए-हाजिर हैं
जी हाँ! हाजिर है–ईंट भट्टों पर/तबेलों में।
हमेशा अधबनी छोड़ दी गई सरकारी कालोनियों के
महानगरीय-नुक्कड़ पर-बेहिसाब बेरोजगारी के ताजा
उपलब्ध आँकड़े बने हुए/हर चौक पर-बेकामी झेलते हुए।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — पंद्रह

वह कब तक बिछाएगा कुर्सियाँ

पनीले कलूटे होंठ
मुस्कराहट में काली गुर्राहट
झाग भरी फुंकार
आह! निःसहाय आदमी
अपनी ही कमजोर बाँहों में कैद है।
चमकीली दीवारें
बेवजह उस पर
आज तक शक करती हैं।
झुलसता है तो और झुलसेगा–वही।
क्योंकि लौट आता है
बार-बार–वह
इसी खूनी घाटी में
जिसमें सदा की तरह
आज भी कुरूप दरख्त
सौन्दर्यानुभूति नहीं जगाते।
क्योंकि लाचार है वह
अपनी ही चमड़ी के भीतर
सदा की तरह
घायल होने को
उसकी अनूठी निष्ठाएँ
घुलती हैं घायल सर्प की भाँति
सुख/दुःख
आशा/निराशा
ताकि वह निर्लिप्त होना सीख ले।
अधिकार मांगना छोड़ दे।
राजनीति उसकी विरासत में नहीं/अधिकार में नहीं।
पैदाइशी का मुकुट है वह तो।
किंतु पांच साल का इतिहास हर बार
सम्मोहित करता है।
इसलिए कि सत्ता के आकर्षक भाषण
और झूठी घोषणाओं के शिलान्यास
सुर्खियों पर छोड़ दिए जाते हैं।

□ □ □

मीडिया के चाकर उसे परोसते हैं–कागजों पर
रोज नकली राष्ट्रीयता की जादुगीरी/और
राजनीति के दलालों की बेशर्मी।
वह–इस बीच के चुनावी-समय में भी
अपने लिए चुनता है–खराब खबरें।
अफराया-अन्नदाता अपहरण/बलात्कार/फिरौती
बेगारी/हत्या से उसे बचाने के बदले में
बस संसद की चौखट तक
पहुँचाने का वादा माँगता है।
किसी बहकावे में वह खोते की तरह खड़ा है
नकारा जगहों पर।
नारों की जुम्बिश के साथ...
उसे जिब्ह होना है–किश्तों में–अमूर्त।
सफेदे के पेड़
उसका पानी पीते हैं और खून भी।
बाकी सब बहुजन हिताय है/किसी की
लुच्ची, भौंडी मुस्कराहट के संग-संग।
नाचता हुआ वह कब तक बिछाएगा
कुर्सियाँ और गलीचे मखलिस्तानों में!

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — सोलह

खाली दायरे

खाली दायरों में–
कितनी घुटी-घुटी साँसों के सारस
कितने तिक्त कितने बेजान लगते हैं।
जमाने के सीने पर
गिरगिट बैठे हैं
जिसकी जैसी आँख होती है
उसे वैसा ही नजर आता है।
इसलिए कौन अपना है/कौन पराया
कुछ भी तो नजर नहीं आता–आजकल।
इन लोगों ने
अपने चश्मों के लैंस बदल लिए हैं।
ताकि पहचान पतली हो सके...
मीठी कल्पना का घर है–वह
प्रवेश द्वार पर पहुँच कर
मेरे अधूरे पाँव बुझने लगते हैं
समूची थकान के बाद
नीति-अनीतियों के जंजाल में/जाल में
नित-नित बदलते मौसम की मार से
बावड़ी और पोखर तक
उथला गए हैं।
यह इंसानों की बस्ती नहीं
यहाँ हर देह पर
कँटीले जंगल उग आए हैं।
यहाँ–सबके सब हाथ नरभक्षी बन गए हैं।
इनकी जुबान नागिन-सी
डँसती है।
ऐसे में एक कदम आगे
मैं फेंक दिया जाता हूँ–गंदगी में।
इसलिए क्या तय मान लिया जाए–
'आज मैं व्यर्थ हो गया हूँ।'

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — सत्रह

अंधेरे के बाद

सालों बाद आज–
कटोरा भर अम्बर खुला है।
भूतहा सायों का नामोनिशान नहीं
विज्ज तड़फड़ाती नहीं
धुंधाते बादलों के भ्रमजाल नहीं
सुथरा मौसम।
पींगों पर नखरे बहुतेरे
धरती की अंकोर में
नया जीवन बल्ले-बल्ले खिल उठा है।
खड़े पंगों/खड़ेतियों के सीने पर
कुंवरी घास ठुमकती है।
बोहड़ की लम्बी बाँह पर
अल्हड़ बचपन की नादानी जैसे झूमती है,
मगरों के गोलारों में–
मानुओं के खग्गे खिड़खिड़ाते हैं,
टाट पलांगों के हाथों पर
सूखी फल्लियों के छैने
नवजात जैसे छुण-छुण करते हैं।
अर्घ्य देते सूरज के चंदोबे,
नव दुल्हन की झुकी पलकों पर
निखरी धूप के सतारे,
खुआड़ों में रुणकती
बैलों के गले में घंटियाँ
कितनी सौम्य कितनी पावन लगती हैं।
खंगारे मारती तोंदी दोपहरी
अचानक पाली बदल कर
बादलों की छाया में छिप जाती है।
कितनी अठखेलियाँ
कितनी हड़मुच्चियों को छोड़ कर
यौवन सुलभ मौसम निथरा है...
सरस्वती की वीणा पर
उमगती रागणियों पर
हारे हुए लोगों का
सिर डोलने लगता है।
निरालंब डोलकर
उतर आना
मानो सुबह की थपली पर बैठकर
जैसे असीम गुरासा देखता हूँ।
थिड़का बालपना,
छलनी-छलनी नौजवानी के
पथरीले अंधेरे हटने लगे हैं...
आज नये जीवन के बसंत
बरबस खिलने लगे हैं
वर्षों के अंधेरे के बाद।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — अठारह

यह कैसी संभावना है

क्या कल एक संभावना है?
सुबह की ताजी धूप में–वह
बार-बार संजीदापोश होकर
अपनी ठण्डी पसलियों को समेट कर
शव साधना की मुद्रा में
तल्लीन दिखाई देता है
हाँ! अक्सर यहाँ
जादुई शब्दों से–
निरीह आदमी को
जानदार जंतु में बदलकर
निर्वस्त्र होने की सीमा तक
पूरा हिसाब-किताब
क्यों देना पड़ता है?
और फिर
सच्चाई का जुमला
भौंडेपन की हद क्यों लाँघ जाता है?
इस वक्त यही विचार रफ्ता-रफ्ता
रेत की लकीरों पर कैसे थम जाता है?
क्या इसी तनाव में आत्मकथाएँ लिखी जाएँ?
या फिर
किसी याचक के मैले हाथ की रेखाओं पर
हर नये मौसम को
पढ़ा जाए?
जिन्दगी ढो रहा हूँ मैं
एक बीमार पत्ते की तरह
न जाने कब
खुली खिड़की के सामने नीले आकाश का
टुकड़ा बेईमान हो जाए
अथवा खोते की पीठ पर
दागा हुआ निशान।
बदनाम सड़क की पहचान बन जाए
मुझे उनसे सख्त शिकायत है
जो दूसरों के पसीने पर
अपनी ढेर सारी अय्याशी जिन्दगी को
पनपता देखना चाहते हैं
फिर लच्छेदार जुबान में
मौका-बेमौका
चरागाहों में घास बन जाते हैं
जिसे खुला छोड़कर चोर दरवाजा
सदा के लिए बंद कर देते हैं।
बेशक वे अपने कारनामों पर
सफेद स्याही पोत दें
दानवीरता के सारे तगमे
उनकी यशगाथा गाते रहें
जमीन में जमीन होकर गड़े रहें
लेकिन इतिहास मुर्दा हो जाने पर भी
उन पर नजर रखेगा।
यह भी एक खुलासा है
इस पर्दादारी का
जिस पर आज तक जिस्म फिसलते आए हैं
मझोले कद्दावर–
ढलती दोपहर के साथ
खींचतान कर
इतने कमजोर कर दिए जाते हैं
गंडासे की तेज धार पर छील कर
उन पर झूठे वादों
और मौकापरस्ती की कतरनें
जुबान की लार से
चिपका दी जाएँ
क्या यह दग़ाबाजी नहीं?
कैसे समझाऊँ–
जिन्हें ऐसे जीने की आदत डाल दी जाती है,
चबूतरों पर यदाकदा
लच्छेदार मुहावरों में
सुनहरे सपनों के बीज बो दिए जाते हैं।
जब ये लोग लंबी भूख सह लेते हैं
तब अपने गले फाड़-फाड़ कर
कल को
अपने झोपड़पट्टे में लाने के लिए
सुनसान सड़कों पर निकल पड़ते हैं
और समूची खुशबू को
उनके गले में पहना देते हैं
लेकिन इस धुकधुकी में
मैं कहाँ तक सोचता चला जाऊँ...
क्या हम लोग
नारेबाजी में ही धूसर होती/मिटती हुई
इक्कीसवीं शताब्दी का इंतजार कर रहे हैं!

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — उन्नीस

पर्दे के पीछे

पर्दे के पीछे
अपनी ही दबंग आहटों
और कमीनी खुसर-फुसर से
ये बेपैंदे के लोटे
सड़क पर दौड़ती बसों के
पंक्चर टायर की भाँति
पिलपिले हो जाते हैं
तब मैं इनसे नहीं
वरन् इनके पुरखों से नफरत कर रहा होता हूँ
स्याह अंधेरी चट्टानों के–खुरदरे चेहरे
नंगे पेड़ पर कौओं के कर्कश बोल
फटे-फटाए गंदे/चिथड़े-चिथड़े बिस्तर पर
बिखरी पिलपिली देह
खूनी मोड़ पर घिचपिच लाश ही
क्यों न हो
तब जीवन और मौत में कोई फर्क नहीं लगता
किंतु मैं इनके बीच रह रहा हूँ।
प्रश्न यहाँ राजनीति का नहीं
आत्मलिंगी होने का स्वांग होता है
चाहे दूर से ही सुनहरी कुर्सी
सिंहासन ही दिखायी क्यों न दे
उस वक्त
सत्ता के तराजू पर
अंशदान देती भौंड़ी राजनीति
बेशक लफंगापन
अपनी सीमा क्यों न लाँघ जाए
तब ये बेपैंदी के लोग
पर्दे के पीछे कुचक्र रच रहे होते हैं
और चाणक्य जैसी महान हस्ती को
बदनाम कर रहे होते हैं
किंतु जब ये शराफत ओढ़ने लगते हैं
तब मैं इनसे अपने को अलग मानकर
अपने वजूद के लिए लड़ रहा होता हूँ।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — बीस

समय के गलियारे

समय रहते संभलिए
बोलती अन्दर रखिए
सूपड़ा मत झाड़िए
थोबड़े पर ताला रखिए
कभी गैरत मत दिखाइए
नकेल दिए जाओगे
यह नया जमाना है–
अपनी तय औकात में रहिए
सीने पर भारी पत्थर रख लीजिए
नहीं तो मेरे दोस्त!
सलीब पर ठोंक दिए जाओगे।
यहाँ सच मत उगलना
देखकर भी अनदेखा कर देना
क्योंकि यहाँ रहजन लोग भीतर से
शतप्रतिशत गन्दगी पसन्द और बाहर से निर्मल।
घर से सड़क तक
सड़क से गलियारों तक
कहीं सफाई की नीयत से
झाड़ू मत छू लेना
रगड़ दिए जाओगे
नहीं तो मेरे दोस्त!
चुटकी में सुपारी लग जाएगी।
कहीं जेबकतरा जेब काट रहा हो
अथवा चौराहे पर
खूबसूरत औरत अपना ही
अपहरण करवा रही हो
और सुनसान कोठे पर बलात्कार हो रहा हो
शोर मत कीजिए
कहीं होश मत गवाँ बैठना
क्योंकि ये सब आज के खेल हैं
जोखिम में पड़ जाओगे
और सुनिए
यह नया मानव-धर्म
कहीं लहूलुहान सड़क पर
घायल आदमी अंतिम साँस ले रहा हो
एक घूँट पानी के लिए
दया मत कीजिए
फंसा दिए जाओगे–
आधी रात को
अपने ही डेरे की कुंडी मत खटखटाइएगा
गैर समझ कर
नतड़ दिए जाओगे
पड़ोसी के घर में
डाकाजी हो
अथवा साठ साल की जब्री की अस्मिता
खतरे में हो
तब भी अपनी ताकत अंदर ही रखिए
नहीं तो
मेरे दोस्त!
कल का सूरज नसीब नहीं होगा।
आह! यह कैसा मानव-धर्म है
जो हम सबको
इक्कीसवीं शताब्दी की ओर ले जा रहा है
जिसके शुरू होते ही
भयंकर जलजले होंगे
ज्वालामुखियों में रफ्तार बढ़ेगी
महाराक्षस जन्मेंगे
इंसानियत गुंडों से दया की भीख मांगेगी, और
घने अंधेरे में
लाशों के ढेर लगेंगे
फव्वारे पानी से नहीं
रक्त से चलेंगे, तब
याद रखना, मेरे दोस्त!
तुम जिन्दगी के ये मंजर
देख नहीं पाओगे।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — इक्कीस

सृजन की पीड़ा

धूल का पंजा उठा
और मेरी खाकों पर आ बिछा।
जिन्हें वर्षों प्यार से सहेजा था
बढ़ना चाहा आगे
किंतु हर मोड़ सर्दीला उकड़ूँ मिला
बेहद बर्फीला
अब धैर्य का सागर सूख चुका
रेत की चादर ओढ़ चुका है
यह जादू उल्लुओं की दहशत भरी
आवाजों के आगोश में
नंगी बरसाती नदी के तटों पर
दूर–दूर तक बिखरा है
आह! कैसी विडम्बना
आज मैं अपनी ही आवाज से
डर जाता हूँ–
क्योंकि हर पेड़ की आड़ में
घात लगाए बैठा है
शब्दजाल
निर्बंध / छंदमुक्त
भूखे जंगली बिलार की तरह
मोटे–मोटे चमकीले डैले फाड़े
मेरे जीवन के हर अर्थ को
रोटी का चुराया हुआ
टुकड़ा समझ कर
खाने को
बारम्बार झपट चुका है–
आज हर नदी
सहमी–सहमी बहती है
हर पहाड़
बुजुर्ग की लाठी का सहारा लिए
पछाड़ खाता
हिचकोले लेता उठता है
जंगलों में सन्नाटा
लस्सी के कटोरे में
बर्फ के टुकड़े की तरह
जमता है–
धरती की पथराई दो आँखें
आकाश गंगा के आँसुओं में भिगोई
ओह! कितनी पीड़ा कुलबुलाती है
मेरे भीतर
सृजन की पीड़ा कहो या मौत की
कोई फर्क नहीं पड़ता
आज मैं अपने दामन को
अनगिनत थिगलियों से सी कर
हर अंधकार से
प्रकाश के डेरे का पता पूछता हूँ
सदियों से जो रूठा है मुझ से
आज बैसाखियों के सहारे ही
उसे मनाने निकला हूँ
किंतु सावधान
भूल भुलैया के चक्र में
दम न तोड़ दूँ
उस चौराहे पर खड़ा हूँ, यारो!
जिसे दिशाएँ
अपनी लपलपाती जिह्वाओं से
लील रही हैं
मेरे भीतर
कुछ धीरे–धीरे
मरणासन्न होने लगा है
इसीलिए सूखे होंठों पर
मौन का पहरा देने लगा है।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — बाईस

अभिशप्त अधूरी ज़िन्दगी

जिन्दगी में
विषैले काँटे चुभते रहे
धूप / छाँव अर्थ बदलते रहे
नदी तटों को तोड़ मिलने आयी–बिदरोह
कब्र तक करवटें बदलती रही
मंदिर का घड़ियाल गूँजता रहा
कहीं छाया में दिन बैठा रहा
और अंधेरे में
यह रात सिसकियाँ भरती रही
दूर आकाश के आगोश में
ये नक्षत्र सारे
गुमसुम लगते रहे
सुहावनी सुबह को
गोद में खिलाने के लिए
हाथ मचलते रहे
काली घटाएँ उमड़ती रहीं
किंतु यह उदास धरती
पिंजरे में पंख फड़फड़ाती रही
और पक्षियों के थके पंख
आकाश के परिहास को सहते रहे
चाँदनी रात देर तक
तड़पती रही...
बालू के ढेर पर
अधूरे सपने फलते रहे।
यह साँवली घास पकती रही।
यह सिलसिला चलता रहा
आशाओं की किरणें
अजनबी दीवारों से
सिर मार–मार कर
घायल होती रहीं।
ग्रीष्म पकता रहा
चिड़ियाँ गर्म रेत पर लोटती रहीं।
और आकाश में बाज
तीखी नजर से लहूलुहान करता रहा
चुपके से
बसंत तड़पता रहा
सच कहता हूँ
यह अधूरी जिन्दगी
ऐसे ही पकती रही फसल की तरह।
वक्त से पहले ही / मानो तो असमय ही
अभिशप्त होती रही बाकी दुनिया भी
मेरे जैसी ही बेबस।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — तेईस

यह कैसा हाल है

अधूरी ज़िन्दगी–वहीं की वहीं।
सच
कितनी निरर्थक हो गयी।
अब तो
अपने दामन में
फफोलों को लिए फिरता हूँ
ज्यों पागल–सा हुआ जाता हूँ
फिर भी क्यों
ये बदलते मौसम
लौट लौट कर धीरज देते हैं
अंधेरे के पार अभी भी
रोशनी खिलखिला रही है–
आशाओं के दीप पर सिरहाने की पेंदड़ी के
बुझ–से गए हैं।

□ □ □

फिर क्यों–ओ मित्र!
तुम यह बार–बार पूछते हो
बीते साल वृक्षों पर
कितनी उपलब्धियाँ अंकुरित हुईं
किंतु सुन सको तो सुनो, ओ मित्र!
मैंने स्वयं को खोकर
कितने असंख्यों को ज़िन्दगी दी है
यह तुम क्या समझो?
यह तुम क्या जानो?

□ □ □

आज ये जो
धूल–धूसरित पगडंडियाँ हैं
सदियों से कड़कती धूप में
कब निष्प्राण थीं–वही
मुझसे मिलने को कितनी आतुर हैं।
यही नहीं–
मेरे सामने ये कुबड़े पहाड़ हैं
इनकी ढली जा रही देह पर अब भी–
मुस्काते झरने आज भी
मुझे इतने क्यों
अपने गले लगाते हैं!
अब तो
यह सूनी घाटी
जो कभी घुटी–घुटी सी रहती थी
इसकी लम्बी सिसकारियाँ
इसकी अविरल अश्रुलड़ियाँ
मेरे ही दिए आधार पर
मधुर रागनियाँ बजाती हैं
आज यह कितने चमकीले पंखों
और शोख चेहरों से भर गयी हैं।

□ □ □

इस दौरान
कब अपनी धरती मुस्काई
कब नन्हीं–नन्हीं कलियाँ खिलीं...
और कब इस आँगन को बहला गयीं
यह इतना बेसब्री से बीता–मैं
यह जान ही न पाया।

□ □ □

अब तो मैं
अंधेरे में लिपटा रहता हूँ

□ □ □

कौन सुने मेरा यह हाल
अपने हाल पर ही रहता हूँ
यह कैसा जोखिम
शेष जीवन में अब नदारद हैं
नये प्रत्यय।

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
कविता — चौबीस

परछाइयाँ

भाग्यशाली आदमी की कलई
जब चमकने लगती है
तब पता नहीं, क्यों
मेरे मन में आक्रोश का लावा उठने लगता है
क्योंकि जब यह जलजला बनता है
तो इसके सामने
जिन्दा आदमी सिर्फ शिकार होता है
अचानक इसका कद ज्यों–ज्यों
ऊँचा उठता जाता है
उस समय
इसकी सुनहरी परछाइयाँ
और इसके गले में
लदे फूलों के हारों का श्रृंगार
खूबसूरत कैमरे के आगे होता है
तब इसके सुनहरी पाँव फूलों पर फिसलकर
अभिनंदन के लिए इजहार कर रहे होते हैं।

□ □ □

तब आम लोगों की मुश्किलें
और बढ़ जाती हैं
अपनी–अपनी जुबान की लार से
सिर्फ शिकार होने के लिए!
उस समय सहमी भीड़
मुर्दों का पण्डाल बन जाती हैं।
और ये नयी शान–शौकत में बड़के
बड़े–बड़े पंखों को फैला कर
अगड़ी पंक्ति के
सिरमौर बन जाते हैं।
पर वफादार लोग
आगे पीछे झपटते नहीं हैं।
सिर्फ भाग्यशाली आदमी के
सेहरे को सहला रहे होते हैं।
ताकि इसकी सत्ता की खुशबू को सूँघ कर
अपने मोर्चे को प्रभावित कर सकें।
तब प्रत्येक श्वेत पत्र में
नये इतिहास को जिन्दा रखने के लिए
जादुई महामंत्रों के नये–नये अध्याय
जोड़े जाते हैं।

□ □ □

बदले में
झूठी तालियों की गड़गड़ाहट थमती नहीं है!
उस समय
पता नहीं, क्यों
बदहाल लोगों का मरियल जोश
मोच खाकर रह जाता है,
यह भाग्यशाली आदमी
अपने कर–कमलों से
गुलाब जल की बौछार लगा देता है
ताकि पेट की ज्वाला को
शांत किया जा सके।
उस समय
पता नहीं, क्यों
किसी तरह की नारेबाजी नहीं होती।
और न ही
खूबसूरत शमियाने भी
मरणासन्न पक्षी की तरह
पंख फड़फड़ाते हैं।
और मरी हुई घास
कुर्सियों के उठने का इंतजार करती है
सिर्फ जिन्दा आदमी की कसमसाई भावनाएँ
इस भाग्यशाली आदमी को
झेल रही हैं–अब तक!
पता नहीं, क्यों
हत्यारी लहरें
हरे–भरे जीवन के समन्दर को
निगल रही हैं। अब भी!!

❖ ❖ ❖
↑ सूची पर लौटें
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कवि के बारे में

योगेंद्र सिंह 'तूर'
योगेंद्र सिंह 'तूर'

हिंदी के संवेदनशील कवि, जिनकी रचनाएँ मनुष्य के अस्तित्व, समाज की असमानताओं और आत्मा की तड़प को मार्मिक ढंग से उकेरती हैं। 'समय नदी है' उनका काव्य-संग्रह है, जिसमें समय को एक अविराम, जीवनदायिनी नदी के रूप में चित्रित किया गया है।