समय नदी है
धूसर समय है और वही सपनीला रहा...
समय नदी है।
छलछलाती इसकी यात्रा अंतहीन–अविरल
जिसे आज तक
कोई रोक नहीं सका
जो अकेले में बहती रही–सन्नाटा पीती हुई।
अपनी डगर की डोर से बँधी भी आगे बढ़ती रही–निर्बाध!
इन्द्रधनुषी होकर भी
असीम सैलाब अपनी छाती पर ढोती रही!
सूखी धरती को हरा–भरा करती रही!
अपना धर्म निभाती रही!
इसे न दुलार मिला, न किसी का प्यार
यह लँगड़ाती
फिसलन पर चलती रही
अपनी डगर आगे बढ़ती रही–
प्रचंड धूप में यह
भूरी चट्टान पर पकती रही
सोते–सी निर्मल
गहरे सँकरे नालों में घुट कर
ऊबड़–खाबड़ में चल–चलकर
तिरछी ढालों पर छल–छल बहकर
आगे बढ़ना सीख गयी
हमेशा अपनी डगर आगे बढ़ती रही!
यह जीवनदायिनी है–
जो हरे–भरे गाँवों, कस्बों
खूबसूरत शहरों से गुजर कर
सबको धोती रही–निर्मला
सबकी मैल पचाती रही।
अपनी डगर आगे बढ़ती रही–
यह तरनतारिणी
शिव उपासिका है
सबका गरल पीकर
अपरिचितों के बीच शोषित रही...!
शीत में सिकुड़ कर
ग्रीष्म में उफन कर
सबकी थकान मिटाती
सफलताओं की कामना करके
यह सबको हँसाती / खिलखिलाती / गुनगुनाती रही।
अपनी डगर आगे बढ़ती नदी...
अपना ताप / अपना ज्ञान
सबको बाँटती हुई
सबकी डाँट,
सबके व्यंग्य बाणों की बौछारें
सबकी फटकार को
अपनी आत्मकथा में पिरो कर
अपने भाग्य को सहलाती रही
अपनी डगर आगे बढ़ती रही–
किसी ने बाँधना चाहा–इसे तो
किसी ने इसकी छाती लहूलुहान कर दी
किसी ने सारी गंदगी फेंक दी–इसके बीचों–बीच!
फिर भी यह जिन्दा और मरों को ढोती रही
सबको प्यार ही बाँटती रही–फ़कत!
अपनी डगर आगे बढ़ती रही–...उज्ज्वला!
अपने जीवन के उत्तरदायित्वों को निभाते
पिता समान पर्वत...
माँ समान मैदान...
भाई / बहन समान नालों के कर्ज को
अपने कतरा–कतरा लहू से
गंगा समान
सबका हिसाब चुकाती रही!
सबकी फाकापरस्ती को दूर कर
खेत–खलिहानों को भरती रही!
सबके मुरझाए चेहरों को खिलखिलाती रही
अपनी डगर आगे बढ़ती रही...पुष्पिता!
अब जीवन के आखिरी पड़ाव पर
यह सोचती है–
न अपना घर हुआ, न घाट...
न अपना मधुर संसार बसा...
न अपनी सुंदर फसलें उगीं...
न थोड़ी देर बैठे विश्राम ही किया।
अब तो
न किसी से कोई प्रतिशोध
न किसी से शिकायत
न किसी पर आरोप
यह अपने गहरे घावों को सहला
अंधेरे में एकांत में / गुमहोशी में...
छिप–छिपकर रोती रही...विलीना!
अपनी डगर आगे बढ़ती रही...जल–पुत्री।
यह सब कर्मों का फल है
जो मिट चले
जितना जीवन में दुःख भोगा
उतना ही स्वच्छ दामन लिए
इस जगती से–
मुक्त हो चली, अब तो
सामने यह विराट सागर
अपनी विशाल बाहें फैलाए
अपने आगोश में भर लेने
मधुर संकेत दे रहा–उसे
तट के उस पार / निमंत्रण मिल रहा है!
(पता नहीं, यह अभिसार है या विदा!)